आयुर्वेदाचार्य कर रहे थे इलाज, बिना फाइनल टेस्ट 28 साल के नौजवान की टांग काटी

आयुषमान कार्ड होने पर भी कैशलैस इलाज नहीं मिल रहा

रवि रौणखर, जालंधर

तहसील के सामने स्वामी सत्यानंद अस्पताल में भर्ती एक मरीज की टांग काट दी गई। जबकि अभी कई टेस्ट बाकी थे। बताया जा रहा है कि मरीज की टांग को सप्लाई देने वाली नाड़ी में ब्लॉकेज थी। पैर में इंफेक्शन फैलने लगा था। इलाज आयुर्वेदाचार्य कर रहे थे। उन्होंने ऑन कॉल डॉक्टर साहब को बुलाया और टांग काट दी गई। जबकि अभी कई टेस्ट बाकी थे। मरीज का पैसा भी गया और टांग भी।

गरीब परिवार से आने वाले इस मरीज के पास आयुष्मान भारत का कार्ड भी था। मरीज का इलाज शहर के कई नामी अस्पतालों में मुफ्त में हो सकता था। मरीज रवि कुमार के भाई सोम का आरोप है कि “इलाज के दौरान हमें अंधेरे में रखा गया। पहले कहा गया कि एक अंगुठा और एक अंगुली काटी जाएगी। फिर कहा पंजा काटना होगा। फिर ऑप्रेशन थियेटर में बुलाया गया कि टखने से पैर काटना पड़ेगा। मगर जब मेरा भाई ऑप्रेशन थियेटर से बाहर आया तो देखा घुटने से नीचे से उसकी टांग काट दी गई थी। हमें पहले कहा गया था कि इलाज में 25000 रुपए का खर्च आएगा लेकिन अब 80000 से ज्यादा खर्च हो चुका है। पहले बताया जा रहा था कि कोई दूसरा डॉक्टर ऑप्रेशन करेगा लेकिन सर्जरी से ऐन पहले कहा गया कि अब कोई दूसरे डॉक्टर साहब आ रहे हैं। हमें समझ ही नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है। क्या मेरे भाई की टांग बचाई नहीं जा सकती थी? मेरे भाई को बस पैर में दर्द रहता था। वह चलकर अस्पताल आया था। अब जिंदगी भर के लिए बैसाखियों के सहारे रहेगा।

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पिम्स की रिपोर्ट। सीटी एंजियोग्राफी की सलाह दी गई है।

रवि कुमार लांबड़ा का रहने वाला है। वह एक फिल्म प्रोडक्शन हाउस के लिए काम करता है। कुछ समय पहले पैर में दर्द होने लगा। अंगुठे में हमेशा दर्द रहती थी। चैक कराया तो पता चला कि नाड़ी ब्लॉक है। उसे खुलवाकर पैर ठीक हो जाएगा। जानकारों के मुताबिक अगर शरीर के किसी भी अंग को खून की सप्लाई बंद हो जाए तो वह सड़ने लगता है। इंफेक्शन जानलेवा भी साबित हो सकता है।

हैरानी की बात है कि मरीज को जनरल वार्ड में रखा गया था लेकिन उससे रोजाना 3500 रुपए लिए जा रहे थे। मरीज के भाई का यह भी आरोप है कि उसके भाई की एंजियोग्राफी नहीं की गई। सोम ने बताया कि “पिम्स में स्कैनिंग के बाद डॉक्टरों ने साफ साफ लिखा था कि एंजियोग्राफी से ही सही तस्वीर साफ हो पाएगी कि ब्लॉकेज कहां पर है। उसके बाद सर्जरी या इलाज किया जा सकता है। मगर अब पता चल रहा है कि यहां न तो एक्सपर्ट डॉक्टर थे और न ही आईसीयू की सुविधा। अस्पताल में आने वाले हड्डियों के पार्ट टाइम डॉक्टर ने तो हमारे मरीज को एक बार भी नहीं देखा। हमें अब पता चल रहा है कि शहर के बड़े बड़े अस्पतालों में आयुष्मान से हमारा इलाज फ्री में हो जाना था। कर्ज उठाकर हमने यह इलाज करवाया है। ईमानदारी के साथ न हमें गाइड किया गया और न ही हमारा सही इलाज हुआ।”

रिएलिटी चैकः अस्पताल में एक भी फुल टाइम मॉडर्न मेडिसिन का डॉक्टर नहीं

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अस्पताल

परिवार के आरोप एक सीमा तक सही भी दिख रहे हैं क्योंकि अस्पताल में मॉडर्न मेडिसिन का एक भी फुल टाइम डॉक्टर नहीं है। मरीज से बातचीत के दौरान लगभग एक घंटा हम वहां रहे लेकिन वहां न तो क्वालिफाइड स्टाफ दिखा और न ही कोई डॉक्टर। अस्पताल के बाहर बड़े बड़े डॉक्टरों के नाम तो हैं लेकिन अस्पताल में पक्के तौर पर कोई भी मॉडर्न मेडिसिन पढ़ा डॉक्टर नहीं बैठता। अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि यहां के इंचार्ज एक आयुर्वेदाचार्य हैं। पार्ट टाइम के लिए हड्डियों के एक वरिष्ठ डॉक्टर भी एक आध घंटा अस्पताल में आते हैं। कुल मिलाकर इस अस्पताल में रुटीन में ओपीडी भी नहीं होती। अगर अस्पताल में रुटीन ओपीडी के लिए मरीज नहीं आते तो समझा जा सकता है कि अस्पताल किस तरह से चल रहा होगा। अब सवाल उठता है कि क्या आयुर्वेदाचार्य एक मरीज की टांग काटने का निर्णय ले सकता है?

टांग काटने से पहले क्या सारे टेस्ट कर लिए गए थे?

मरीज का इलाज आयुर्वेदाचार्य कर रहे थे। पिम्स के डॉक्टरों के मुताबिक मरीज की एंजियोग्राफी करनी जरूरी थी। ऐसे में सीधे टांग काटने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? अस्पताल न तो वेंटिलेटर है। न डॉक्टर। न आईसीयू। ऐसे में जब अस्पताल में सुविधाएं ही नहीं हैं तो ऐसे मरीज को भर्ती करना कहां तक जायज था? सारे टेस्ट किए बिना सर्जरी करना क्या सही निर्णय था?

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अस्पताल के वार्ड के बाहर धूल की चादर में लिपटी कुर्सियां अस्पताल की दशा बता रहे हैं।

हमने खर्चा बचाने के लिए एंजियोग्राफी नहीं करवाई- डॉ. गुरप्रीत

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जनरल वार्ड में लेटा मरीज लेकिन परिवार का आरोप है चार्ज आईसीयू के लगाए हैं।

अस्पताल के स्टाफ से जब हमने डॉक्टर से बात करवाने के लिए कहा तो रिसेप्शन पर बैठे स्टाफ ने डॉ. गुरप्रीत से हमारी बात करवाई। डॉ. गुरप्रीत ने बताया कि वह मान मेडिसिटी में क्रिटिकल केयर विभाग में कार्यरत हैं। अस्पताल का बचाव करते हुए कहा कि ” इस केस में कोई डॉक्टर हाथ नहीं डाल रहा था। मरीज को हैपाटाइटिस सी है। ऑप्रेशन डॉ. डांग ने किया है। डॉ. गुरप्रीत ने बताया कि मरीज गरीब परिवार से था। उसकी एंजियोग्राफी करवाते तो खर्च बढ़ जाता। इसलिए डॉक्टरों ने सीधे टांग काटने का निर्णय लिया। यह निर्णय सही भी साबित हुआ क्योंकि जब पंजा काटा गया तो पता चला कि खून की सप्लाई पूरी तरह से बंद थी। इसलिए घुटने से नीचे से टांग काटी गई। अगर यह इंफेक्शन शरीर में फैल जाता तो सेप्टिसीमिया होने का डर था। यानी पूरे शरीर में संक्रमण फैल सकता था जो कि जानलेवा साबित हो सकता है। डॉक्टरों ने मरीज की जान बचाने के लिए उसकी टांग काट दी। मरीज को हैपाटाइटिस सी भी था। अगर वह यह इलाज किसी बड़े अस्पताल से करवाता तो खर्च लाखों में पहुंच जाता। इस अस्पताल में बेहद कम दाम में मरीज का इलाज हुआ है। जहां तक टांग काटने की बात है उसके इलावा डॉक्टरों के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। “

टांग काटना आखिरी रास्ता नहीं था!

DOCTORS IN JALANDHAR
  • जिस तरह से पटेल अस्पताल में डॉ. शर्मा हैं। चावला अस्पताल में डॉ. चावला, सत्यम में डॉ. पसरीचा, अरमान अस्पताल में डॉ. छाबड़ा, सर्वोदय में डॉ. त्रिवेदी। शहर में ऐसे कई बड़े और छोटे अस्पताल हैं लेकिन उन्हें चलाने वाले डॉक्टरों की अपनी एक पहचान है। मगर स्वामी सत्यानंद में कोई ऐसा नाम नहीं है। मरीज के परिजनों ने जो जानकारी दी है उसके हिसाब से इस अस्पताल और किसी भी नामी अस्पताल के रेट में भी कोई फर्क नहीं है। उसके बावजूद एक मरीज की टांग काटने का निर्णय लिया जाता है। बिल भी ठीक ठाक बना दिया जाता है।
  • क्या मरीज का आयुष्मान कार्ड देखकर उसे किसी हायर सेंटर रेफर नहीं किया जा सकता था?
  • नाड़ी में खून की सप्लाई के माहिर से तो कोई सलाह भी नहीं ली गई।
  • एक हैरत करने वाली बात यह भी है कि डॉ. गुरप्रीत न तो स्वामी सत्यानंद के डॉक्टरों की पूरी जानकारी दे पा रहे थे और न ही मरीज की सर्जरी करने वाले डॉ. डांग से कभी वह मिले थे। ऐसे में अस्पताल ने उनसे हमारी बात क्यों करवाई।
  • विवादित मामलों में डॉक्टर खुलकर एक्सपर्ट ओपीनियन नहीं देते। शहर के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि ऐसा नहीं है कि मरीज की टांग काटना ही आखिरी रास्ता था। इस केस में बहुत कुछ किया जा सकता था। टांग बच सकती थी।

One thought on “आयुर्वेदाचार्य कर रहे थे इलाज, बिना फाइनल टेस्ट 28 साल के नौजवान की टांग काटी

  • 02/03/2020 at 7:59 pm
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    घोर लापरवाही । दरअसल देश में काबिल डॉक्टर रहे ही नहीं। और जो हैं वे प्राइवेट अस्पतालों में काम कर रहे हैं, जहाँ मालिकों का दवाब होता है मरीज आया ते मोटा बिल बना। Every employed doctor has been given a target.

    No matters how minor is patient’s disease, once admitted make all possible surgery and serve normal food thali with higher rates like hotel and rastorants.

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